स्वाद के साथ खतरे की सच्चाई
हम भारतीयों की थाली में समोसा-जलेबी और कचौरी जैसे देसी स्नैक्स का विशेष स्थान है। चाय के साथ समोसा, त्योहारों में जलेबी और हल्की भूख में कचौरी – ये सब न केवल स्वादिष्ट हैं बल्कि हमारी संस्कृति का हिस्सा भी हैं। हाल ही में सोशल मीडिया पर यह चर्चा गर्म थी कि सरकार इन फूड्स पर चेतावनी लेबल लगाने वाली है। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि ऐसी कोई विशेष एडवाइजरी नहीं जारी की गई है। फिर भी, सवाल यही है – क्या इन स्वादिष्ट लेकिन अनहेल्दी स्नैक्स पर चेतावनी वाकई जरूरी है?
भ्रम बनाम हकीकत: सरकार की स्थिति
कुछ वेबसाइट्स और सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया कि समोसा-जलेबी जैसे स्ट्रीट फूड्स पर ‘खतरे की चेतावनी‘ लगाई जाएगी। कहा गया कि स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस बारे में दिशा-निर्देश दिए हैं। बाद में PIB ने इन खबरों को फेक बताया। मंत्रालय की ओर से दी गई एडवाइजरी दरअसल ऑफिस और कार्यस्थलों पर हेल्दी फूड को बढ़ावा देने के लिए थी, न कि देसी स्ट्रीट फूड को टारगेट करने के लिए।
लेकिन क्या खतरा वाकई नहीं है ?
यह सच है कि सरकार ने कोई विशेष निर्देश नहीं दिए हैं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि समोसा-जलेबी और कचौरी पूरी तरह सुरक्षित हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, इन स्नैक्स का नियमित सेवन कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है:
- मोटापा
- हाइपरटेंशन (उच्च रक्तचाप)
- टाइप-2 डायबिटीज
- हार्ट अटैक और स्ट्रोक
भारत सरकार के राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार, देश में 23% पुरुष और 24% महिलाएं ओवरवेट हैं। BMC Public Health की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 31.5 करोड़ लोगों को हाइपरटेंशन है, जबकि 10.1 करोड़ लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं।

ये स्नैक्स आखिर क्यों खतरनाक हैं ?
1. मैदा (रिफाइंड फ्लोर)
समोसे और कचौरी का बाहरी आवरण मैदे से बनता है जिसमें न तो फाइबर होता है, न ही विटामिन और मिनरल्स। यह केवल खाली कैलोरी देता है।
2. बार–बार इस्तेमाल किया गया तेल
सड़क किनारे बनने वाले समोसे-जलेबी में एक ही तेल को बार-बार गर्म किया जाता है, जिससे ट्रांस फैट और एक्रिलामाइड ( एक्रिलामाइड एक रासायनिक पदार्थ है, जो अधिक तापमान पर तले या भूने गए खाद्य पदार्थों में बनता है और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है।) जैसे हानिकारक तत्व बनते हैं। यह कैंसर, लिवर और दिल की बीमारियों का कारण बन सकते हैं।
3. अत्यधिक चीनी
जलेबी में शक्कर की मात्रा बहुत ज्यादा होती है, जो सीधे ब्लड शुगर बढ़ाती है। बच्चों और डायबिटिक मरीजों के लिए यह बेहद खतरनाक हो सकता है।
4. आलू और स्टार्च
समोसे में इस्तेमाल होने वाला आलू भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट देता है लेकिन पोषण बहुत कम। यह वजन बढ़ाता है और डायबिटीज के रिस्क को बढ़ाता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं ?
डॉ. शिवम खरे (गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, सर गंगाराम हॉस्पिटल) बताते हैं कि:
“समोसा, जलेबी और कचौरी जैसी चीजें स्वाद में जरूर बेहतरीन हैं, लेकिन इनका शरीर पर असर धीमा जहर जैसा होता है। इनमें पोषक तत्व कम और कैलोरी, फैट व शुगर ज्यादा होते हैं। बार-बार सेवन से मेटाबॉलिक बीमारियां (मेटाबॉलिक बीमारियाँ वे होती हैं, जो शरीर की ऊर्जा बनाने की प्रक्रिया में गड़बड़ी के कारण होती हैं, जैसे डायबिटीज़ या मोटापा।) होने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है।”
सवाल-जवाब: जो आपको जानना चाहिए
Q1. क्या हफ्ते में एक बार समोसा-जलेबी खा सकते हैं?
उत्तर: अगर आपकी सेहत ठीक है और बाकी खानपान संतुलित है, तो हफ्ते में एक बार कम मात्रा में खाया जा सकता है। लेकिन हाई बीपी, डायबिटीज या मोटापा होने पर यह भी नुकसानदायक हो सकता है।
Q2. क्या बच्चों के लिए ये ज्यादा खतरनाक हैं?
उत्तर: हां। बच्चों का पाचन तंत्र (मेटाबॉलिज्म) और रोगों से लड़ने की ताकत (इम्यून सिस्टम) अभी बन रही होती है।। ज्यादा फैट और चीनी उन्हें जल्दी नुकसान पहुंचा सकती है।
Q3. क्या वर्कआउट करके नुकसान को रोका जा सकता है?
उत्तर: व्यायाम जरूरी है लेकिन वह खराब खानपान का पूरा असर नहीं रोक सकता। वर्कआउट के बावजूद ट्रांस फैट और शुगर का दुष्प्रभाव शरीर पर रहता है।
Q4. सुरक्षित मात्रा क्या है?
उत्तर: WHO के अनुसार:
- चीनी: दिन की कुल कैलोरी का 5% (लगभग 5-6 चम्मच)
- तेल: 3-4 चम्मच तक, वो भी हेल्दी फैट हो
- मैदा: जितना कम हो, उतना अच्छा
हल्के और हेल्दी विकल्प क्या हैं ?
- समोसे को डीप फ्राई करने की बजाय बेक करें या एयर फ्रायर में बनाएं
- मैदे की जगह आटे या मल्टीग्रेन आटे का प्रयोग करें
- आलू की जगह मिक्स वेज, पनीर या स्प्राउट्स भरें
- जलेबी की जगह गुड़ से बनी मिठाइयाँ, सूखे मेवे, बेक्ड रसगुल्ला या फ्रूट चाट ट्राय करें
- रिफाइंड तेल की जगह सरसों का तेल, ऑलिव ऑयल या कोल्ड प्रेस्ड ऑयल चुनें
स्वाद और सेहत – दोनों का संतुलन कैसे ?
स्वाद छोड़ना मुश्किल है, लेकिन इसे सेहतमंद तरीके से बनाए रखना मुमकिन है। डॉ. खरे के अनुसार, मसाले वही रहें, बस पकाने का तरीका और सामग्री थोड़ी बदली जाए। बच्चों को शुरुआत से ही हेल्दी वर्जन का स्वाद देना ज़रूरी है, ताकि वे बाद में भी संतुलित खानपान को अपनाएं।
निष्कर्ष: चेतावनी भले न हो, समझदारी जरूरी है
सरकार भले ही समोसा-जलेबी पर चेतावनी लेबल न लगाए, लेकिन हमें खुद समझदारी से काम लेना होगा। स्वाद के पीछे सेहत से समझौता करना समझदारी नहीं है। समय है कि हम अपने खानपान में छोटे-छोटे बदलाव लाएं और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें।


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